चंडीगढ़.
हरियाणा के सरकारी स्कूलों में चार लाख फर्जी दाखिलों के मामले में सीबीआइ को ठोस सुबूत नहीं मिले हैं। 12 हजार 924 स्कूलों के रिकार्ड की जांच में सिर्फ 50 हजार 687 छात्र संदिग्ध मिले। हालांकि जांच के दौरान रिकार्ड में बड़ी गड़बड़ियां मिलीं, लेकिन किसी अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ आपराधिक साजिश के पुख्ता सबूत नहीं मिले। ऐसे में सीबीआइ ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल कर दी है। सीबीआइ की विशेष अदालत ने यह रिपोर्ट फिलहाल स्वीकार नहीं की है।
सीबीआइ कोर्ट ने कहा कि इतने बड़े स्तर पर सामने आई अनियमितताओं के बाद मामले को सीधे बंद नहीं किया जा सकता। कोर्ट पहले पूरी फाइल का अध्ययन करेगी, उसके बाद ही अगला फैसला लिया जाएगा। इस पूरे प्रकरण की शुरुआत वर्ष 2016 में हुई थी, जब अतिथि अध्यापकों की याचिका पर हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रदेश सरकार ने 22 लाख छात्रों का रिकार्ड पेश किया। जब इनमें से कुछ नामों की जांच की गई तो कई नाम संदिग्ध पाए गए। इसी आधार पर आशंका जताई गई कि स्कूलों में फर्जी दाखिले दिखाकर सरकारी योजनाओं का लाभ लिया जा रहा है।
बाद में मामला सीबीआइ को सौंप दिया गया। इसके बाद सीबीआइ ने राज्य के 12 हजार 924 सरकारी स्कूलों का रिकार्ड खंगाला। प्रवेश रजिस्टर, हाजिरी, मिड-डे मील, छात्रवृत्ति, यूनिफार्म और परीक्षा रिकार्ड तक की जांच की गई। जांच में 50 हजार 687 छात्र संदिग्ध पाए गए। कुछ जिलों में गड़बड़ी का प्रतिशत पांच प्रतिशत था, जबकि कुछ में यह 40 प्रतिशत तक पहुंच गया। कई बच्चों की शत प्रतिशत हाजिरी दर्ज थी, जबकि वे स्कूल छोड़ चुके थे। मामलों में स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट जारी होने के बाद भी नाम रिकार्ड से नहीं हटाया गया।
अब सीबीआई अदालत पर निगाहें
सीबीआइ की स्पेशल कोर्ट ने फिलहाल क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार नहीं की है। अदालत पूरी जांच रिपोर्ट पढ़ेगी और जरूरत पड़ी तो जांच का दायरा बढ़ाने या दोबारा जांच के आदेश भी दे सकती है। इस तरह मामला अभी पूरी तरह बंद नहीं हुआ है। अंतिम फैसला अदालत के अध्ययन और सुनवाई के बाद ही सामने आएगा।
सात जिलों में मिली अधिक अनियमितताएं
मेवात के नूंह, गुरुग्राम, सोनीपत, झज्जर, फतेहाबाद और यमुनानगर समेत सात जिलों में सबसे ज्यादा गड़बड़ी सामने आई। सीबीआइ के मुताबिक रिकार्ड में खामियां हैं, लेकिन जानबूझकर धोखाधड़ी या व्यक्तिगत लाभ के स्पष्ट प्रमाण नहीं मिले। कई एंट्री जिला स्तर पर बदली गईं, लेकिन यह साबित नहीं हो पाया कि किसने और किस मकसद से बदलाव किया। एजेंसी के अनुसार लापरवाही और प्रशासनिक स्तर की गलतियां तो दिखीं, पर आपराधिक मामला बनता नहीं दिखा। साथ ही सुप्रीम कोर्ट के 2019 के आदेश का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि स्कूल रिकार्ड से जुड़े प्रशासनिक फैसलों पर सीधे आपराधिक मुकदमा नहीं बनाया जाए।

